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चैत्र छठ महापर्व की शुरुआत, नहाय-खाय के साथ आस्था का संगम; पटना समेत पूरे बिहार में व्यापक तैयारी
- Reporter 12
- 22 Mar, 2026
चार दिवसीय कठिन व्रत में सूर्योपासना का विशेष महत्व, 36 घंटे निर्जला रहकर व्रती करती हैं पूजा; घाटों पर सुरक्षा और सुविधाओं के पुख्ता इंतजाम
लोक आस्था और श्रद्धा का अद्वितीय पर्व चैत्र छठ की शुरुआत हो चुकी है। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व का आरंभ नहाय-खाय के साथ हुआ, जिसके साथ ही बिहार सहित पूरे पूर्वांचल में भक्ति और आस्था का वातावरण गूंज उठा है। इस पर्व में व्रती महिलाएं अपने परिवार, विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भगवान सूर्यनारायण की उपासना करती हैं।
चैत्र माह में मनाया जाने वाला यह पर्व कार्तिक छठ की तरह ही अत्यंत पवित्र और कठिन माना जाता है। इसमें व्रती 36 घंटे तक कठोर नियमों का पालन करते हुए निर्जला उपवास रखती हैं। इस दौरान शुद्धता, संयम और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है।
राजधानी पटना सहित राज्य के विभिन्न जिलों में छठ महापर्व को लेकर तैयारियां पहले से ही पूरी कर ली गई थीं। गंगा तटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल रही है। खासकर गांधी घाट पर बड़ी संख्या में व्रती महिलाएं स्नान कर पूजा-अर्चना करती नजर आईं।
व्रती महिलाओं का कहना है कि यह पर्व उनकी आस्था का प्रतीक है और वे इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाती हैं। उनका मानना है कि छठी मैया और सूर्य देव की कृपा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
छठ महापर्व की विधि बेहद व्यवस्थित और क्रमबद्ध होती है। पहले दिन ‘नहाय-खाय’ के साथ व्रत की शुरुआत होती है, जिसमें व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन ‘खरना’ मनाया जाता है, जिसमें पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम को पूजा कर गुड़ और चावल से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसी के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
तीसरे दिन षष्ठी तिथि को छठ पूजा का मुख्य अनुष्ठान होता है। इस दिन व्रती अपने परिवार के साथ नदी, तालाब या अन्य जल स्रोतों के किनारे पहुंचकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। यह दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है, जब अस्त होते सूर्य के सामने दीप, फल और पूजा सामग्री के साथ श्रद्धालु अपनी भक्ति अर्पित करते हैं।
चौथे और अंतिम दिन सप्तमी तिथि को प्रातःकाल उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है। इसके बाद व्रती पारण करती हैं और प्रसाद का वितरण होता है।
इस वर्ष चैत्र छठ महापर्व का कैलेंडर इस प्रकार है—
22 मार्च: नहाय-खाय
23 मार्च: खरना
24 मार्च: संध्या अर्घ्य
25 मार्च: उषा अर्घ्य और पारण
धार्मिक दृष्टि से इस पर्व का विशेष महत्व है। ज्योतिष और कर्मकांड के जानकारों के अनुसार, छठ पूजा प्रकृति और सूर्य देव की आराधना का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में हर अंत के बाद एक नई शुरुआत होती है। सूर्य, जो ऊर्जा और जीवन के स्रोत हैं, उनकी उपासना के माध्यम से लोग अपने जीवन में सकारात्मकता और शक्ति की कामना करते हैं।
छठ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। इस दौरान समाज के सभी वर्गों के लोग एक साथ मिलकर इस पर्व को मनाते हैं। साफ-सफाई, सहयोग और अनुशासन इस पर्व की पहचान बन चुके हैं।
इधर, प्रशासन ने भी इस महापर्व को लेकर व्यापक इंतजाम किए हैं। पटना के सभी प्रमुख घाटों पर सुरक्षा और सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया है। जिला प्रशासन ने 25 मार्च तक विशेष सुरक्षा व्यवस्था लागू की है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
घाटों पर महिलाओं के लिए अलग से चेंजिंग रूम बनाए गए हैं। इसके अलावा शौचालय, पीने के पानी की व्यवस्था, मेडिकल कैंप और कंट्रोल रूम स्थापित किए गए हैं। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जगह-जगह बैरिकेडिंग और माइक सिस्टम लगाए गए हैं, जिससे लोगों को दिशा-निर्देश दिए जा सकें।
सुरक्षा के मद्देनजर वाच टावर भी बनाए गए हैं, जहां से पुलिसकर्मी पूरे इलाके पर नजर रख रहे हैं। प्रशासन की ओर से बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई है। इसमें महिला और पुरुष दोनों तरह के पुलिसकर्मी शामिल हैं, ताकि किसी भी स्थिति से निपटा जा सके।
पटना के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, घाटों पर लगातार गश्ती की जा रही है। पैदल गश्ती दल, लाठी पार्टी और पेट्रोलिंग वाहन चौबीसों घंटे सक्रिय हैं। साथ ही, किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए कंट्रोल रूम भी बनाए गए हैं, जहां से पूरी व्यवस्था की निगरानी की जा रही है।
कुल मिलाकर, चैत्र छठ महापर्व एक बार फिर पूरे बिहार में आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। जहां एक ओर व्रती अपनी श्रद्धा और तपस्या के जरिए भगवान सूर्यनारायण की आराधना में लीन हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन इस महापर्व को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।
यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, अनुशासन और सामूहिकता का संदेश भी देता है।
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